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प्राथमिक चिकित्सा का महत्त्व एवं सिद्धान्त

किसी भी दुर्घटनाग्रस्त या अचानक बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति को प्रथम रूप से तुरंत दिए जाने वाले उपचार को प्राथमिक चिकित्सा कहते हैं | परिभाषा के तोर पर हम तुरंत और अस्थाई रूप से मिलने वाली सहायता जो कि एक रोगी क्षणिक आराम दे सके,उसको जब तक कि एक शिक्षित अथवा प्रमाणित डाक्टर उसका इलाज कर सके,उसको हम प्राथमिक चिकित्सा कहते है | तड़पते हुए रोगी को उचित और तुरंत सहायता (उपचार) पूर्ण रूप से देना आवश्यक है यदि हम उसका जीवन बचाना और कष्ट कम करना चाहते है | प्राथमिक चिकित्सा अपने आप में परिणाम नहीं है |प्राथमिक चिकित्सा से हमें संकेत मिलता है कि पीड़ित व्यक्ति को आगे और भी सहायता की जरूरत है | जनरल असमार्च (1823-1908) एक विख्यात जर्मन शल्य चिकित्सा ने सबसे पहले कल्पना करके प्राथमिक चिकित्सा के विषय में खोज निकली | सन् 1877 में सैट जॉन्स एम्बुलैंस समिति का लन्दन में निर्माण हुआ | सन् 1920 में रैड क्रास संस्था का भारत में निर्माण हुआ | इस युग में प्रोधोगिकी द्वारा पेचीदे उपकरण और तेज गति से चलने वाले यातायात निर्मित किए | इसी कारण दुर्घटनाओ में बढ़ोतरी हुई है जिसके कारण विनाशकारी हादसे जैसे जीवन का नष्ट होना,या शरीर और दिमाग में गहरी चोट लगना | इन परिस्थितियों के रहते प्राथमिक उपचार ने एक महत्त्वपूर्ण स्थान ले लिया है | जब प्राथमिक चिकित्सक घटनास्थल पर पहुंचता है तो वहाँ पर कभीकभी दुर्घटना के मूल कारण मोजूद रहते है जो कि रोगी को लगातार नुकसान पहुँचाते रहते हैं |

प्राथमिक चिकित्सा का महत्त्व

प्रभावशाली प्राथमिक चिकित्सा देने के लिए ये जरूरी है कि प्राथमिक चिकित्सा देने वाले व्यक्ति को मनुष्य के शरीर की रचना का विज्ञान और मनुष्य के शरीर की जीवन पद्धति,व्यावहारिक बुद्धि और अनुभव का ज्ञान होना चाहिए | प्राथमिक चिकित्सा विशेषकर इसलिए आवश्यक है |

  1. प्राथमिक चिकित्सा का तुरंत उद्देश्य है कि विशेष अवस्था में किसी व्यक्ति के जीवन को बचाना |
  2. प्रथम लक्ष्य प्राथमिक चिकित्सक को है कि व्यक्ति के दर्द को कम करना,और उसकी चोट और परेशानी को आगे बढने से बचाना |
  3. प्राथमिक चिकित्सा सहायक होती है चोट को आगे बढ़ने से रोकने में |इसके द्वारा उन परिस्थितियों को ठीक होना चाहिए जो कि प्रारंभिक चोट को बढ़ाती है |
  4. प्राथमिक चिकित्सा को बाद में डॉक्टर या अस्पताल के कर्मचारी से मिलाने वाले उपचार का आधार बनना चाहिए |
  5. इसको करने के लिए हमें दुर्घटना की विस्तृत सूचना, चोट तथा व्यक्ति को दिया गया प्राथमिक उपचार आदि का पता होना चाहिए | प्राथमिक चिकित्सा का अंतिम उद्देश्य व्यक्ति को म्रत्यु एवं विकलागंता से बचाना है |

मनुष्य के शरीर की प्रक्रिया को जानने और चोट तथा बीमारी में मिलने वाली सहायता के लिए हमें ज्ञान हासिल करना होगा | यह एक अच्छी शुरुआत का विषय है ‘चिकित्सा विज्ञान’ को उपयोगी (व्यावहारिक) रूप से दिशा देने का |

प्राथमिक चिकित्सा की सीमाएँ (Limitation of First Aid)

  1. प्राथमिक चिकित्सा को नियमों का ध्यान रखना चाहिए और प्राथमिक चिकित्सा के लक्ष्य को जानते हुए बहुत शीघ्रता और सतर्कता से काम करना चाहिए |
  2. प्राथमिक चिकित्सक को यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए की वह डाक्टर नहीं है |
  3. घाव को किसी औजार और अपनी अंगुलियों से न छूऐ |
  4. रोगी को अनावश्यक हिलायेंडुलायें नहीं |
  5. उसके अन्दर रोगी तथा रोगी के निकट संबंधियों में विश्वास दिलाने की क्षमता होनी चाहिए |
  6. जान बचाने के लिए तीन हालातों में प्राथमिक चिकित्सक को बुलाना चाहिएश्वास का रुक जाना, बहुत अधिक खून का बहना और सदमा पहुँचना |
  7. आघात को नजरअन्दाज न करे |
  8. घावों को धोयें नहीं |
  9. बेहोश व्यक्ति के मुँह से तम्बाकू, नकली दांत और अन्य कोई भी वास्तु निकालने से न चुके |
  • अगर साँस की प्रक्रिया सही नहीं है, अगर होंठ, जीभ और नाखून नीले पड़ जाएँ |ऐसी अवस्था में, ‘कृत्रिम श्वसन’ (Artificial respiration) तुरंत देना चाहिए |
  • अगर बहुत तेजी से रक्त बह रहा है, वह या अधिक घाव में से बहता है या फिर बड़ी नसों द्धारा | ऐसी स्थिति में हमें घाव के ऊपर कास के दबाव डालना चाहिए | इसके लिए एक साफ रुमाल या एक पैड को घाव पर रख कर दोनों हाथ का जोर लगाकर दबाना चाहिए और फिर उस पट्टी पर पट्टी बंधनी चाहिए |
  • तीसरा आवश्यक कारण है रोगी को सदमे की स्थिति में तुरन्त ध्यान देना | सदमें के साथ गहरी चोट और भावात्मक घबराहट (बाधा) भी आ जाती है | ठंडी और नम त्वचा, माथे और हथेली पर पसीने की बूंदे होना | चेहरे का पीलापन, जी मिचलाना, उल्टी आना सदमें के सामान्य लक्षण हैं |
  1. उसे किसी भी रोगी को मृत घोषित नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह उसके कार्यक्षेत्र में नहीं है |

प्राथमिक चिकित्सा के सुनहरे नियम (Golden Rules of First Aid)

  1. आप संयम बनाकर शीघ्रता दिखाएँ | क्रमानुसार काम करें | धैर्यपूर्वक सभी बड़ी चोट और घावों को खोज लें और उपयुक्त रूप से उपचार करें |
  2. सांस लेने की विफलता के मामले में, कृत्रिम श्वसन तुरन्त शुरू कर दें |
  3. रक्तस्राव को रोकने के लिए, दबाव अंकों पर पैड से लगातार घड़ी देखकर 4-5 दिन के लिए दबाव डालना चाहिए | प्रारंभिक पैड को न हटाकर, एक के ऊपर एक पैड लगाकर दबाव डालना चाहिए |
  4. रोगी को सदमे में नहीं जाने देना चाहिए | यदि सदमा गहरा हो तो रोगी को प्राथमिकता देते हुए पहले अस्पताल ले जाना चाहिए |
  5. यदि मौसम सही हो – न ज्यादा गर्म न ज्यादा ठंडा, ना बारिश हो, तो हताहत व्यक्ति का उपचार खुले में करना चाहिए | अन्यथा घायल को पास के सुरक्षित स्थान जैसे बरामदा या खुले कमरे में ले जाना चाहिए | चरम मौसम की स्थिति में हताहत की हालत बहुत जल्दी बिगड़ती है | उदहारण के लिएगर्मी से लू लगे रोगी को अधिक गर्मी में सड़क से तुरन्त छायादार, ठंडी जगह पर ले जाना चाहिए |
  6. हताहत के लिए निकटतम चिकित्सा सहायता के लिए परिवहन की व्यवस्था करनी चाहिए |
  7. प्राथमिक चिकित्सा उपकरणों का उपयोग करें | अगर मानक प्राथमिक चिकित्सा उपकरण उपलब्ध हों तो उसका उपयोग करें | वरना प्राथमिक चिकित्सक को पहले उपकरण में सुधार करना चाहिए |
  8. हताहत के आसपास लोगों की भीड़ इकटठी होने से रोकनी चाहिए | ताजी हवा आनी चाहिए |
  9. सावधानी से उसके कपड़ों को उतरना चाहिए | उसको और चोट नहीं लगनी चाहिए | शरीर को गरमाई मिलनी चाहिए और सदमे में बचाव होना चाहिए | रोगी को सबसे तेज चलने वाले परिवहन से डॉक्टर या अस्पताल भेजना चाहिए | यदि कोई गंभीर दुर्घटना हो तो पुलिस को सूचना देनी चाहिए |

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