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एड्स (AIDS)

     पर्यायवाची— आयुर्वेदिक नाम — ओजक्षय, रोग का पूर्णनाम — एक्वार्ड इम्यून डिफीसिएन्सी सिण्ड्रोम (Acquired Immune Deficiency Syndrome— AIDS) |

रोग परिचय, कारण व लक्षण

‘एड्स’ उपरोक्त पूर्ण नाम का संक्षिप्त रूप/नाम है | एक्वायर्ड इम्यून डिफीशियेन्सी का अर्थ/मतलब है ’ रोग से शरीर की रक्षा प्रणाली का कमजोर पड़ जाना | ‘सिण्ड्रोम’ शब्द को सतही रूप से रोग का प्रर्याय माना जा सकता है | वस्तुतः यह लक्षणों के एक समूह के लिए प्रयोग किया जाता है | ‘एड्स’ के मामले में यह लक्षणों का समूह मात्र नहीं वरन् रोगों का समूह भी है |

रोग के प्रमुख कारण

  • एड्स को उत्पन्न करने वाला एक विषाणु (वाइरस)प्रमुख कारण है जिसे चिकित्सा वैज्ञानिकों ने एच.टी.एल.वी. -3 का नाम दिया है | (यह यौन रोग सम्बन्धी इक्कीसवाँ विषाणु है |
  • एल.ए.वी.(LAV) (पूरा नाम लिम्फेडिनोपैथी एसोसिएटिड वाइरस) यह एक वैज्ञानिक समूह द्धारा प्रमाणित नाम है |

एच.आई.वी.(H.I.V.) यानि ’ह्यूमन इम्यूनोडिफीसिएन्सी वाइरस’ के संक्रमण की उत्तर दशा अथवा विकसित अवस्था है |

‘एड्स’ यह विषाणु शरीर की ‘रोग प्रतिरोधक प्रणाली’  की धीरे-धीरे नष्ट करके रोगी को अन्य संक्रामक | छूत के रोग और कुछ और प्रकार के कैन्सरों से अपनी रक्षा में असमर्थ बना देता है |

 

सहायक कारण (रोग प्रसार माध्यम)

  • समलैंगिक यौन सम्बन्ध पीड़ित व्यक्ति में से तीन-चौथाई से भी अधिक (लगभग 75%) व्यक्ति समलैंगिग यौन सम्बन्धों (गुदा मैथुन/लौण्डेबाजी) के कारण प्रभावित होते हैं |
  • एड्स रोग ग्रस्त व्यक्ति/रोगी के साथ-मैथुन करने से |
  • एड्स विषाणु संक्रमित सिरिंज व सुई (नीडिल) द्धारा नशीली औषधियों का सेवन करने से, नाइयों के उस्तरों आदि से अथवा शल्य चिकित्सकों (सर्जन) के बिना भली प्रकार विसंक्रमित (स्टरलाइजेशन) किये गये औजारों के प्रयोग से लगभग ऐसे 15% व्यक्ति प्रभावित
  • एड्स रोग से ग्रस्त व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से रक्त चढाने (ब्लड ट्रान्सफ्यूजन) से 1 ऐसे प्रभावित रोगियों की संख्या लगभग 5% है |
  • शेष रोगियों में यह रोग ‘वेश्यागमन’ तथा कालगर्ल्स के माध्यम से प्रभावित होता है |
  • एड्स रोग से पीड़ित माताओं के गर्भ से पैदा होने वाले बच्चों में भी-इस रोग का संक्रमण हो जाता है | यह रोग गर्भावस्थ शिशु तक को प्रभावित कर देता है |

रोग के मुख्य लक्षण

  • अज्ञात लक्षणों वाला ज्वर | (एक माह से अधिक अवधि तक)
  • रात्रिस्वेद (पसीना) व घबराहट |
  • शरीर भार (वजन) में अकारण 10% की कमी |
  • लसीका ग्रन्थियों में शोथ | सम्पूर्ण बदन में सूजी हुई लिम्फ ग्रन्थियाँ |
  • अतिसार | (एक माह से अधिक आने वाले पानी सदृश पतले दस्त) |
  • त्वचा के रंग में बदलाव/परिवर्तन |
  • मुख व भोजन नलिका में-सफेद चित्तियाँ |
  • बेचैनी और सतत थकान |
  • रक्त में श्वेत कणों (W.B.C.) का ह्रास |
  • गुदा मार्ग में अकारण व्रणों की उत्पत्ति |
  • विभिन्न प्रकार के त्वचीय विकार |
  • बार-बार होने वाला हर्पीज जोस्टर |
  • न्यूमोनियां आदि का होना |
  • सिर, नाक तथा छाती का कफ से भरा रहना |
  • शिरःशूल, भ्रम तथा दृष्टि (नजर) का धुँधलापन |
  • अकारण एक माह से अधिक समय तक कष्टदायक खांसी की उपस्थिति |
  • मुख व गले में मोटी सफेद परत | मुख व ग्रसनी में फैला हुआ कैण्डिला संक्रमण |

रोगी की घातकावस्था में

  • आधुनिक त्वचा रोग कार्पोसीज सारकोमा |
  • किसी भी चिकित्सा का अनुकूल लाभ न मिलना वरन् क्रमशः रोग वृद्धि |
  • गम्भीर मानसिक विकृतियाँ तथा स्मरण शक्ति का ह्रास |
  • किसी भी प्रकार के निर्णय लेने की क्षमता का अभाव |

रोगी को रोग की आरभिकावस्था में इस बात का तनिक भी एहसास नहीं होता है कि उसे ‘एड्स’ हो गया है, किन्तु जब रोग के विषाणु बढ़ने लगते हैं तो फिर उसको बचाना एक अत्यन्त ही मुश्किल/नामुमकिन कार्य हो जाता है |

रोग की पहचान

[रोग की सम्प्राप्ति काल 1-7 वर्ष (औसतन 4-5 वर्ष) ]

  • दौर्बल्यता |
  • ज्वर |
  • अतिसार (महीनों तक) |
  • कष्टदायक सूखी खांसी |
  • शारीरिक क्षीणता |
  • शरीर पर कहीं-कहीं या सम्पूर्ण जिस्म पर खुजली युक्त फुन्सियाँ |
  • विसर्प |
  • मुखयाकीय चिन्ह |
  • कक्ष (वक्षण), गर्दन आदि स्थानों पर लसीका ग्रन्थि शोथ |
  • रात्रि स्वेद (मुख्यतः शरीर के ऊपरी भाग में) |
  • पी.सी.एफ. प्रकार का न्यूमोनियां |

रक्तदाता के रक्त की (एड्स से सुरक्षा हेतु) की जाने वाली जांचे —

  • वेस्टर्न टलांटिग टेस्ट |
  • रेडियो इम्यूनो पर्सुयुडियोन एनालिसिस |
  • एलिया टेस्ट |

—एड्स की पहचान हेतु ‘सीरम विज्ञान’ (सिरोलांजी) की मदद लेनी पड़ती है | ‘एलिसाटेस्ट’ के कुछ दोष भी हैं | अतः ‘बेस्टर्न ब्लाट टैस्ट’ से सही स्थिति का पता लगाना चाहिए |

  • डिप्सटिक— यह जाँच एड्स वाइरस के प्रति पिण्ड की उपस्थिति का पता लगाने हेतु की जाती है (इस जांच प्रक्रिया में ‘एलिसा’ की तुलना में व्यय 8 गुना कम आता है | अतः यह एक सस्ती जांच प्रक्रिया है तथा इसमें समय भी कम लगता है |
  • एड्स रोगी के पक्के निदानार्थ— उसके खून की विभिन्न जाँचें (ब्लड टेस्ट्स), एक्स-रे, प्रभावित अंग की त्वचा और मांस आदि का परीक्षण (बायोप्सी) आदि विभिन्न विकृत विज्ञानीय परीक्षणों तथा दर्शन, स्पर्शन और प्रश्नों द्धारा रोगी का सूक्ष्मतम निरीक्षण व परीक्षण करने के उपरान्त ही रोग का विनिश्चय किया जाता है |

रोग का परिणाम

  • पौष्टिक आहार (प्रोटीन व विटामिन्स से भरपूर आहार) लेने पर भी रोगी का शारीरिक भार निरन्तर घटता जाता है | कुछ समय के बाद जब रोगी के शरीर में घातक संक्रामक रोग का आक्रमण होता है तब रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी) के अभाव में रोगी शीघ्र ही अन्य तमाम रोगों की गिरफ्त में आ जाता है |
  • एड्स का वाइरस जब ‘मस्तिष्क’ में प्रविष्ट हो जाता है तब 20% रोगियों में नीचे लिखे लक्षण उत्पन्न होते हैं —
  • स्मरण शक्ति (याददाश्त) का ह्रास |
  • समस्त प्रकार के निर्णय लेने की क्षमता में कमी |
  • कभी-कभी आंशिक रूप से पक्षाघात/अंग घात (फालिज) |
  • और अन्ततः शरीर के स्नायुतन्त्र (नर्वस सिस्टम) पर शारीरिक क्रियाओं पर से नियन्त्रण (कण्ट्रोल) समाप्त |

प्रारम्भिक एड्स

काफी समय तक रहने के बाद जब गम्भीर एड्स में परिवर्तित हो जाता है, तब नीचे लिखे लक्षण रोगी में उत्पन्न होते हैं —

  • फेफड़ों व ज्ञान तन्तुओं तक संक्रमण तथा अवयवों की अत्यधिक क्षति |
  • त्वचा का घातक कैंसर (कोर्पोसीज सारकोमा) के विकास की आशंका |
  • रोगी में एनीमिया, ल्यूकोमिया, गम्भीर जाण्डिस व कैन्सर आदि तथा मादक रोग पैदा होकर शीघ्र विकसित होने लगते हैं |
  •   रोगी के ज्वर और अतिसार/दस्तों का प्रमाण बढ़ जाता है | यह दोनों ही रोग कष्ट चाहें कितना ही उपचार किया जाये आराम/ठीक नहीं होते हैं | अन्ततः रोगी निरन्तर मृत्यु मुख की ओर अग्रसरित हो जाता है |

मृत्यु और मात्रा मृत्यु

  • जब रोगी को संसार की किसी भी प्रचलित चिकित्सा पद्धति द्धारा समुचित/भर्सर उपचार के उपरान्त भी अनुकूल लाभ प्राप्त नहीं होने पा रहा होता है तब क्रमशः उसके रोग वृद्धि के साथ ही मात्रा मृत्यु ही दिखाई देती है |
  • ‘एड्स’ एक अत्यन्त ही घातक तथा जानलेवा रोग है, जिसका लाखों/करोंड़ों रूपया व्यय करके भी रोग का कोई स्थायी उपचार कदापि सम्भव नहीं है, मात्र ‘मृत्यु के समय’ को कुछ बढाया जा सकता है |
  • उचित चिकित्सा के अभाव में रोग और भी अधिक घातक |
  • ‘लाक्षणिक चिकित्सा’ के द्धारा एड्स रोगी का जीवन कुछ महीनों से लेकर 2-3 वर्ष तक बढाया/बचाया जा सकता है |
  • निर्बल, रोग प्रतिरोधक क्षमता शून्य, उपद्रव युक्त सम्पूर्ण लक्षणों से युक्त रोगी की शर्तिया शीघ्र ही मृत्यु हो जाती है |

 

 

 

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