पीलिया शारीर के द्रवों में पित्त वर्णक (Bilirubin) का स्तर जब सामान्य से अधिक हो जाता है तो रोगी पीलिया ग्रसित हो जाता है |

पीलिया रोगी को औषधियाँ देने में सावधानियाँ –

पीलिया रोगी को ऐसी औषधियाँ बिल्कुल नहीं देनी चाहिये जो यकृत विषाक्त हो या वह यकृत द्वारा उत्सर्जित हो | जैसे-

  • Rifampin
  • Chloramphenicol
  • Tetracycline

पीलिया के रोगी को केवल वाही औषधि देनी चाहिये जो यकृत की सुरक्षा करती है | जैसे-

  • Livomyn Syp
  • लिव-52 Syp
  • हिपेटोगार्ड फोर्ट टैबलेट
  • हिपामर्ज टैबलेट

पीलिया के रोगी का उपचार करते समय गर्भनिरोधक गोली बंद कर देनी चाहिये और जब रोगी पूर्ण रूपेण ठीक हो जाये तो औषधियाँ पुनः प्रारंभ की जा सकती हैं |उच्चरक्त चाप (High Blood Pressure)- Nifedipine टैबलेट/कैप्सूल इसका उपयोग मुँह द्वारा किया जाता है | जब रक्त चाप बहुत जल्दी कम करना हो तो कैप्सूल की दवा को जीभ के निचे निचोड़ दिया जाता है |

  • Felodipine (फेलोडिपाइन)
  • एमलोडिपाइन
  • नाइट्रेडिपाइन

सावधानियाँ-

Verapamil तथा Diltiazom औषधियाँ ह्रदय निष्क्रियता सिंक साइनस सिंड्रोम हार्ट ब्लाक की स्थिति में तथा जो रोगी बीटारोधी औषधियाँ ले रहे हों नहीं देनी चाहिये |

बीटारोधी औषधियाँ-

ये उच्चरक्त चाप के लिये बहुत उपयोगी होती हैं |

  • एटीनोलोल
  • मेटाप्रोलोल
  • प्रोपेनोलोल
  • इस्मोलोल
  • नोडोलोल आदि

विशेष सावधानियाँ-

बीटारोधी औषधियाँ निम्न स्थिति में नहीं देनी चाहिए-

  • दमा के रोगी
  • मधुमेह
  • ह्रदय गति
  • बाएँ निलय की निष्क्रियता
  • मंदता
  • हार्ट ब्लाक

Typhoid (मियादी बुखार)-

इसके रक्त परीक्षण निम्न है-

  • ब्लड कल्चर (Blood Culture)
  • क्लॉट कल्चर (clot Culture)
  • अस्थिमज्जा कल्चर (Bone Marrow Culture)

विडाल टेस्ट (Widal Test)-

यह टेस्ट टाइफाइड के रोगियों के लिये सर्वाधिक उपयोग में लाया जाता है |

औषधियाँ-

  • ओफ्लॉक्सासिन
  • सिपरोफ्लॉक्सासिन
  • नारफ्लॉक्सासिन

अमोक्सीसिलिन-

यह एंटीबयोटीक भी टाइफाइड के रोगियों के लिये बहुत उपयोगी है |

मलेरिया के रोगी का HB% बहुत कम हो जाता है |

T.L.C –

मलेरिया के साथ यदि अन्य कोई संक्रमण नहीं हो तो WBC की संख्या सामान्य अथवा सामान्य से कम होती है | मलेरिया परजीवी के कारण WBC की संख्या बढती नहीं है |

ESR-

इसमें ESR बहुत बढ़ा होता है |

सीरम बिलीरुबिन-

तीव्र मलेरिया में जब RBC का अपघटन होता है, सीरम बिलीरुबिन की मात्रा बहुत बढ़ जाती है |

मलेरिया रोग की औषधि-

  • Chloroquine (क्लोरोक्वीन)
  • Mefloquine (मेफ्लोक्वीन)
  • Sulfonamides (सल्फोनामाइड)

इन औषधियों के साथ Paracetamol एवं Antacids देनी चाहिये |

प्रोटीन की कमी से-

  • भार में कमी
  • पीलिया
  • इन्फेक्सन होने की सम्भावना
  • सामान्य कमजोरी
  • ओडिया

विटामिन के कार्य

  • शरीर वृद्धि में सहायता देना |
  • शरीर की क्रियाशील तथा स्वस्थ बनाये रखने के लिये |

विटामिन की कमी से होने वाले लक्षण –

  • भूख कम लगना
  • कमजोरी, थकान घबराहट और चिडचिडापन
  • नींद कम आना व रोगों से संबंधी रोग होना

विटामिन डी की कमी से होने वाला रोग-

  • (Ricket) सूखा रोग
  • ओस्टोमलेशिया (Osteomalacia)
  • ओस्टियोपोरेसिस (Osteoporosis)
  • टिटैनी
  • दांतों में विकार

विटामिन ई लाल रक्ताणुओं का संरक्षण करता है |

महिलायों के प्रजनन अंगों पर विटामिन ई का कोई प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं है | इस विटामिन की कमी से उपापचयन क्रियाएं असंगठित हो जाती हैं, जिससे संतानहीनता या बार-बार गर्भपात हो जाता है |

संक्रमण (Infection)-

  • तीव्र अतिसार (Acute Diarrhea)
  • इ. कोलाई अतिसार (E. Coli Diarrhea)
  • जठरान्त्रशोथ (Gastroenteritis)
  • खुनी पेचिश (Bacillary Dysentery)
  • वसूचिका या हैजा (Cholera)
  • आन्त्रिक ज्वर (Typhoid Fever)
  • विषाणुज रोग (Viral diseases)-
  • विषाणुज जठरान्त्रशोथ (Viral Gastroenteritis)
  • विषाणुज अतिसार (Viral Diarrhea)
  • विषाणु यकृतशोथ (Viral Hepatitis)

बच्चों में प्रोटीन की कमी होने से प्रोटीन ऊर्जा कुपोषण (PEM) हो जाता है | जो भारत में 6 माह से 3 वर्ष तक की आयु के बच्चों में पाये जाता है |

शिशु-बच्चों में वैक्सीनेशन-

    B.C.G.- जन्म के समय 1 टीकाकरण होना चाहिए | अन्तः त्वचीय

    O.P.V.- 6 सप्ताह से 9 माह 1-1 महीने के अन्तराल पर 3 मुँह द्वारा |

    डी.पी.टी.- 6 सप्ताह से 9 महीने पर 3 माह के अन्तराल पर, अन्तः पेशीय|

    खसरा- 9 से 12 माह पर 1 अन्तः त्वचीय |

    बच्चों में –

    डी.पी.टी.- 6 से 24 माह 1 अन्तः पेशीय |

    ओ.पी.वी.- 6 से 24 माह 1 मुँह द्वारा |

    डी.टी.-
    5 से 6 साल 1 अन्तः पेशीय |

    टायफाइड- 5 से 6 साल 2 एक माह के अन्तराल पर त्वचा के नीचे |

    टी.टी.- 10 वर्ष एक अन्तः पेशीय |

    टायफाइड- 10 वर्ष एक त्वचा के नीचे |

    टी.टी.- 16 अन्तः पेशीय |

    टायफाइड- 16 वर्ष 1 त्वचा के नीचे |

    B.C.G.- यह टिका क्षय रोग के विरुद्ध प्रयोग किया जाता है |

    D.P.T.- यह टीके का प्रयोग डिफ्थिरिया, टिटैनस तथा काली खांसी के प्रति सक्रिय रोग क्षमता उत्पन्न करने के लिये प्रयोग किया जाता है |

    D.T.- यह टीके डिफ्थिरिया, टिटैनस के प्रति सक्रिय रोग क्षमता उत्पन्न करने के लिये प्रयोग किया जाता है |

    T.T.- यह टीका टिटैनस के प्रति सक्रिय रोग क्षमता उत्पन्न करते हैं |

    O.P.V.- यह टिका पोलियो रोग के प्रति सक्रिय रोग क्षमता उत्पन्न करते हैं |

    खसरा वैक्सीन- यह रोग खसरा रोग के प्रति सक्रिय रोग क्षमता उत्पन्न करते हैं |

    नियोनेटल पीरिएड- जन्म लेने के बाद पहले 28 दिन का समय नियोनेटल पीरिएड कहलाता है |

    अर्लीनियोनेटल पीरिएड- जन्म के प्रथम 7 दिन का समय अर्लीनियोनेटल पीरिएड कहलाता है |

    लो बर्थ वेट-
    जन्म के समय नवजात शिशु का वजन 2500 gm. से कम होना लो बर्थ वेट कहलाता है |

    स्टिल बॉर्न (Still Born)- यदि नवजात शिशु के पैदा होने पर उसमे जीवन के लक्षण जैसे श्वास लेना, ह्रदय की धड़कन न पायें जायें तो उसे स्टिल बॉर्न कहते हैं |

    जन्म के समय न रोना (Birth Apexia)- जो बच्चे जन्म के समय रोते नहीं हैं उन्हें तुरंत रुलाना चाहिये या पास के किसी बाल रोग विशेषज्ञ के पास ले जाना चाहिये | जन्म के समय बच्चे का रोना अति आवश्यक है, वरना बच्चे को किसी भी प्रकार शारीरिक या मानसिक क्षति हो सकती है |

    हैजा (Cholera)- यह गम्भीर जठरान्त्र शोथ का ही एक रूप है | इसमें अचानक बिना प्रयास किये ही अत्यधिक मात्रा में बड़े-बड़े चावल के पानी जैसे दस्त होना प्रारम्भ हो जाते हैं | कुछ देर बाद उल्टियाँ होना शुरू हो जाती है | इसमें रोगी के शरीर में पानी की कमी हो जाती है | यदि शीघ्र ही उचित चिकित्सा न की जाये तो रोगी सदमे की स्थिति में आ जाता है, यहाँ तक की मृत्यु भी हो सकती है |

    जाँचे- मल का सामान्य परीक्षण

    मल का कल्चर

    सीरम इलेक्ट्रोलाइट

    उपचार- निर्जलीकरण का उपचार

    एंटीबायोटिक्स (Antibiotics)

    लेक्टोबेसीलाई (Lactobacilli)

    प्रत्यम्ल (Antacid)

    वमन रोगी औषधि (Antimetics)

    अतिसार के रोगी को ORS का घोल देना चाहिए |

ब्रेन स्ट्रोक (Brain Stroke)-

मस्तिष्क में रक्तस्राव होने अथवा धनास्र या अन्तःशल्य के बन जाने से मस्तिष्क की धमनियों में अवरोध उत्पन्न होता है, के कारण व्यक्ति बेहोश हो जाता है | इसी को आघात या स्ट्रोक अथवा ब्रेन स्ट्रोक कहते हैं |

ब्रेन स्ट्रोक के कारण रोगी पर प्रभाव-

ब्रेन स्ट्रोक के कारण रोगी को लकवा मार जाता है |

ब्रेन स्ट्रोक से प्रभावित होने वाले रोगी-

    मोटापा

    उच्चरक्तचाप

    मधुमेह

    हाइपर कोलेस्ट्रोलीमिया

    अत्यधिक मदिरापान

अवसाद (Depration)-

दुःख और उदासीनता की स्थिति को अवसाद कहते हैं जिन व्यक्ति को नींद न आना, किसी भी कार्य में दिलचस्पी न लेना और व्यक्ति आत्महत्या के बारे में सोचता है, ऐसे रोगी भी Depration का शिकार होते हैं |

अवसाद उत्पन्न करने वाली औषधियाँ-

उच्चरक्तचाप रोधी औषधियों का प्रमुख स्थान है | जैसे- Atenolol, Metropdolol, Labetalol.

    Analgesics-

    औषधियों को लम्बे समय तक लेने से अवसाद हो जाता है |

    Antibiotics-

    Levafloxocin, Gatifloxacin, Ofloxacin, Rifampicin, Dapsone, Clofazimine, Cefriaxone, Ceftazidime इन औषधियों का लम्बे समय तक उपयोग करने से रोगी अवसाद की स्थिति में आ सकता है |

    Premature Menopause-

    सामान्यतः महिलाओं में 40-45 वर्ष की आयु में रजोनिव्रत्ति प्रारम्भ होती है यदि किसी महिला में रजोनिव्रत्ति 40 वर्ष से पूर्व प्रारंभ होती है तो उसे पूर्व रजोनिव्रत्ति कहते हैं |

    Leucarrhoea-

    श्वेत प्रदर महिलाओं की वह स्थिति है जिसमे उनकी योनि में आने वाले सामान्य स्राव की मात्रा में वृद्धि हो जाती है श्वेत प्रदर के रोगी महिलाओं में योनि से निकलने वाले इस स्राव के सूखने पर भूरे रंग का दाग उनके अधोवस्त्रों पर पड जाता है | रोगी को खराब स्वास्थ्य के कारण श्वेत प्रदर होता है |

    अन्य-

      मासिक धर्म की अनियमितता (Irregularity of Menses)

      अधिक बार प्रसव (Frequent Deliveries)

      गर्भपात (Abortion)

      गर्भाशय ग्रीवा की विद्रर्णता

      कृत्रिम गर्भनिरोधक का प्रयोग

      अधिक रतिक्रिया

    Pelvice Inflamnatory Diease (P.I.D.)-

    जो स्त्रियों में जो जननमार्ग संक्रमण के द्वारा ऊपर श्रेणी गुहा में पहुँचकर जननांगो जैसे- गर्भाशय, डिबवाहिनी, अण्डाशय तथा उदरगुहा के अनेक महत्वपूर्ण अंगो जैसे- यकृत आंत्र, एपेन्डिक्स, पेरिटोनियक आदि को प्रभावित करता है | P.I.D. के रोगियों में बाँझपन सर्वाधिक महत्वपूर्ण है |

    PID उपचार में एंटीबायोटिक्स बहुत महत्वपूर्ण है |

Neisseria Gonorrhoeae ChlamydiaTrachomatis नमक जीवाणु श्रोणीशोध (PID) उत्पन्न करने वाले प्रमुख सूक्ष्म जीव हैं | इनके उपचार हेतु एंटीबायोटिक्स प्रारम्भ करने चाहिए |

  • एम्पीसिलीन
  • एमोक्सीसिलीन
  • ओफ्लोक्ससीन
  • सिफोटेक्सिम
  • टेट्रासाइक्लीन
  • जेटामाइसीन

यदि रोगी में श्रोणी शोथ रोग (PID) का कारक माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस हो तो रोगी को पूर्ण टी.बी. रोधी उपचार ATT देना चाहिए |

Gonorrhoea (सूजाक)-

यह स्त्री पुरषों में नाइसीरिया गोनोरी द्वारा फैलने वाला एक योनि रोग है | यह रोग मुख्य रूप से समागम द्वारा फैलता है | नवजात शिशुओं में यह रोग प्रशव के दौरान माँ से फैलता है | यह रोग आँखों को प्रभावित करता है |

असामान्य मासिक रक्तस्राव –

मासिक चक्र की अवधि 21 दिन से कम हो या 35 दिन से अधिक हो |मासिक रक्तस्राव की अवधि 7 दिन से अधिक हो |दो मासिक रक्त्स्रावों के बीच रक्तस्राव होता हो तो यह स्थिति असामान्य मासिक रक्तस्राव कहलाती है |

एक Menstrul Cycle की सामान्य अवधि 28 दिन की होती है |Estrogen- Menstrual Cycle में सर्वाधिक महत्वपूर्ण Ovarian Harmone है |

गर्भपात-

28 सप्ताह से पूर्व गर्भाशय से सम्पूर्ण गर्भ का बाहर निकल जाना या उसके टुकड़े-टुकडे होकर बाहर निकलना गर्भपात कहलाता है |
ऐसे स्थान पर जहाँ डॉक्टर नहीं हैं- वहाँ पर एक अनुभवी और दक्ष नर्स अंतरित जाँच कर निश्चित गर्भपात का निदान किया जाता है |
तत्काल मिथरजिन इंजेक्शन दें |यदि सदमे के चिन्ह दिखयी दे रहें हों अथवा रक्तस्राव अधिक हो रहा हो तो डेक्स्त्त्रोज या रिंगर लेक्टेट लगाना अति आवश्यक है |

गुर्दे की पथरी का प्रयोगशाला परीक्षण-

    मूत्र परीक्षण

    उदर का साधारण एक्स-रे

    आई. वी. पी.

    उदर का अल्ट्रासाउंड

    उदरका सी.टी. स्कैन

ह्रदयघात के रोगी का प्रयोगशाला परीक्षण-

    ई.सी.जी.

    रक्त परीक्षण

    इकोकार्डियोग्राफी (दिल का अल्ट्रासाउंड)

    कोरोनरी एंजियोग्राफी

तपेदिक-

तपेदिक एक संक्रामक रोग है | यह माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस के कारण होता है जो मुख्यतः फेफड़ों को प्रभावित करता है |भारत वर्ष में इसे संशोधित राष्ट्रीय तपेदिक नियंत्रण कार्यक्रम (Revised National Tuberculosis Program- RNTCP) के नाम से चलाया जाता है |यह कार्यक्रम RNTCP विश्व स्वास्थ्य संगठन WHO के निर्देशानुसार चलाया गया |

तपेदिक रोग का प्रयोगशाला परीक्षण-

    रक्त परीक्षण

    बलगम व एक्स-रे

तपेदिकरोधी औषधियाँ

    आइसोनाईजिड

    रिफेम्पिसिन

    पायरेजिनामाइड

    इथाम्बूटाल

    स्ट्रेप्टोमाइसीन

गठिया वाय-

गठिया वाय को वाट जनित संधिशोथ भी कहते हैं | यह हड्डी के जोड़ों का ऐसा रोग है जो रोगी को बिल्कुल पंगु या अपाहिज बना देता है | धीरे-धीरे अस्थिसंधियों को उपास्थि नष्ट हो जाती है |

    अनेक संधियों में तीव्र पीड़ा

    अस्थिसंधियों में सुजन

    अस्थिसंधियों को छूने में दर्द

परीक्षण-

    RH factor

    ESR

    HB%

    एक्स-रे

गठिया वाय की औषधियाँ-

Leflunomide, Minocycline, R-Globulin, Hormone, Replaceement theraphy (HRT), Cyclosporin, Monoclonal

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